भाजपा इस खेल की सबसे माहिर खिलाड़ी है 

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मनोज सिरोही

विशेष रिपोर्ट

‘धर्म सत्ता के सहारे राज सत्ता’ का खेल फिर पड़ गया भारी

बेनकाब नहीं होता तो भविष्य का बड़ा मठाधीश संत होता  ‘रामवृक्ष’ यादव

-धर्म सत्ता से राज सत्ता पर काबिज होेने के उपक्रम की कड़ी था रामवृक्ष

-भाजपा इस खेल की सबसे माहिर खिलाड़ी है

मथुरा। संतों के सहारे सत्ता हासिल करने का खेल एक बार फिर भारी पड़ गया। कोर्ट की फटकार, खुफिया महकों की आशंकाओं और भारी संख्या में जुट रहे अनुयाईयों की हकीकत को दर किनार कर हरियाणा सरकार ने रामरहीम के  समर्थकों के प्रति वह सख्ती नहीं दिखाई जो बरती जानी चाहिए थी। इस नरमी का नतीजा भी वही रहा जो पिछल साल मथुरा में जवाहरबाग में देखने को मिला था। उत्तरांचल में जयगुरुदेव और रामवृक्ष के अनुयाई सपा को सत्ता हासिल करने में मददगार नजर आ रहे थे तो हरियाणा में भाजपा को रामरहीम के समर्थकों में यही संभावना दिख रही थी। हरियाणा में 17 विधान सभा सीट ऐसी हैं जहां रामरहीम का प्रभाव रहा है। इसी लालच में हरियाणा की खट्ट सरकार विपरीत हालातों से पिनटने के लिए किसी नतीजे पर पहुंचने में देर कर गई तो यूपी में अखिलेश सरकार को कोर्ट के आदेश के बाद भी एक्शन में आने में लम्बा वक्त लगा। सच का जाये तो अखिलेश सरकार एक्शन में नहीं आई और अधिकारियों को मजबूरी में आधी-अधूरी तैयारी के साथ कर्रवाई करनी पड़ी थी। पास उल्टा नहीं पड़ता और दो जांबाज अफसरों की जान नहीं जाती तो आला अधिकारियों पर गाज गिरना तय था। यही वहज रही कि जब तत्कालीन एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी जवाहरबाग में घुसे डीएम और एसएसपी मौके पर नहीं थे।

खेर जो सोचा वह हुआ नहीं और जो नहीं सोचा था वह घटित हो गया, इस कांड की जांच सीबीआई कर रही है, जिसे कोर्ट से कई मर्तबा फटकार मिल चुकी है। सत्ता का आशीर्वाद फलीभूत हो जाता तो आज रामवृक्ष यादव भी पहुंचे हुए संतों की श्रेणी में होता। कहिए कि किस्मत ऐन मौके पर गच्चा दे गई, अन्यथा यही रामवृक्ष  जवाहरबाग में बैठ कर हजारों-लाखों लोगों को प्रभु प्राप्ति का रास्ता बता रहा होता और अपने लिए जवाहरबाग जैसी दूसरी जगहों को हड़पने के रास्ते खोल रहा होता। सरकार ही नहीं विपक्ष के भी बड़े-बड़े नेता आशीर्वाद लेने के लिए कतार में होते, आशीर्वाद में लेकर क्या जाते यह कोई कभी समझ नहीं पाता लेकिन  रामवृक्ष यादव की चरणरज पाने की ललक ऐसे होती कि कितने ही लोगों के लिए ‘रामवृक्ष नाम प्रभु का होता’  जवाहरबाग की करीब 280 एकड़ भूमि को 99 साल के पट्टे पर देने की पूरी तैयारी हो गई थी। यह बात भी अब छुपी नहीं रह गई है कि इतने बड़े आशीर्वाद के पीछे किसका हाथ था। बनते-बनते खेल बिगड़ गया और भविष्य के एक बड़े संत के चेहरे से नकाब उतर गया। हकीकत सामने आई तो लोग दंग रह गए। रामवृक्ष संत से राक्षस में तब्दील हो गया। किसी पहुंचे हुए  कथित मठाधीश संत को राक्षस में तब्दील होने की यह पहली कहानी नहीं है और आखिरी भी नहीं। संत का राक्षस रूप कब लोगों के सामने आजाये कोई नहीं जानता, बस नकाब उतरने की  बात है। आज रामवृक्ष जवाहरबाग का बवाली है। दर्जनों मौतों का जिम्मेदार है। इस समय देश के सबसे बड़े अपराधियों में से एक है। वह लोग भी रामवृक्ष यादव को अपराधी बता रहे हैं जिनके इशारे पर रामवृक्ष यादव इस स्थिति में पहुंचा कि सिस्टम को खुल कर चुनौती देने लगा। वक्त रामवृक्ष यादव के साथ नहीं था।  भारतीय उपमहाद्वीप से यूरोप तक धर्म और सत्ता का गहरा नाता रहा है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जब धर्म ही सत्ता का संचालन करता है। यह कई बार प्रतक्ष तो कई बार अप्रतक्ष रूप से होता है। धर्म सत्ता के जरिये राज सत्ता पर हावी होने के भी इतिहास में कई सटीक उदाहरण हैं और धर्म सत्ता को सीढ़ी बना कर राज सत्ता पर काबिज होने की प्रक्रिया को वर्तमान भारतीय राजनीति के जरिये बेहतरीन तरीके से समझा जा सकता है। धार्मिक भावनाओं के ज्वार-भाटा को नियंत्रित करने और इसे अपने पक्ष में इस्तैमाल करने के लिए राज सत्ता पर काबिज लोग हमेशां मठाधीशों को आश्रय देते हैं। कानूनी और गैरकानूनी तरीके से इन्हें लाभ पहुंचाते हैं। धर्म के जरिये एक बड़े समूह तक पहुंचना और उस समूह को वोट बैंक की तरह अपने पक्ष में इस्तैमाल करने की उपक्रम की ही जवाहरबाग एक कड़ी था। सब कुछ बेहद सतर्क और योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया जा रहा था। कुछ किस्मत कुछ कानूनी अड़चन कहिए कि खेल बनते बनते बिगड़ गया। जो भारतीय जनता पार्टी आज जवाहरबाग कांड को लेकर आग बबूला है, उसी भाजपा सरकार ने खुद कितने ही लोगों को मठ, मंदिर और आश्रम बनाने के लिए हजारों ऐकड़ जमीन लीज पर नहीं दी है। भाजपा की बातों को अगर पूरी तरह सच भी मान लिया जाये कि रामवृक्ष को उत्तर प्रदेश सरकार में बैठे लोगों का समर्थन हासिल था तो इस पर कम से कम भाजपा को इतना हो हल्ला नहीं मचाना चाहिए। धर्म सत्ता का उपयोग कर राज सत्ता पाने का भाजपा से कठिन और सफल उपक्रम इस देश में आजादी के बाद किसी दूसरे समूह अथवा राजनीतिक दल ने नहीं किया है। इस उपक्रम से उपजे घातक परणतियों को भोगा सभी ने है लेकिन भाजपा को कोसा किसी ने नहीं है। वर्तमान में भी भाजपा इसी उपक्रम को दोहराने की तैयारी में है। अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि यूपी की राज सत्ता को हासिल करने के लिए वह अपने दम और विकास कार्यों के सहारे आगे बढ़े कि एक बार फिर धर्म सत्ता को सीधी बना कर राज सत्ता पर काबिज होने के अपने पुराने फार्मूले पर ही काम करे और हर बार जब भी भाजपा संकट में होती है तो धर्म की आड़ लेती है लोगों की भावनाओं को भड़काती है, वोट मांगती है, उन्मांद पैदा करती है, समाज के तानेबाने को तारतार कर देती है, यूपी का हर चुनाव सामाजिक संरचना और भाईचारे के धागों को और कमजोर कर जाता है। अगर लखनऊ में बैठे सत्तशीन लोगों ने रामवृक्ष यादव के सहारे लाखों लोगों को साधने और उनको अपने वोट बैंक के रूप में स्तैमाल करने की जुगत भिड़ाई तो यह कोई नया प्रयोग नहीं था। बस बात इतनी सी है कि यह प्रयोग फेल हो गया।

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